नज़र मिली, दिल का मौसम बदला
मोहब्बत कभी सीधे रास्तों पर कहाँ मिलती है? वो तो एक नज़र की हलचल बनकर आती है, चेहरे पर बादल-सी उतरती है, और दिल का मौसम चुपचाप बदल जाता है।
वो सामने जो आए, धूप का आलम बदल गया,
हवा में घुली नज़र, हर इक ग़म बदल गया।
पलकों पे घिरे बादल, आँखों में सावन की नमी,
बस इक नज़र मिली थी, दिल का मौसम बदल गया।
— Ashish, सुबह ७ बजे से पहले
जेठ की इक तपती दोपहर थी,
सूनी-सी हर राह, हर डगर थी।
दिल भी उस मौसम-सा ही था,
बरसों से बस धूप में जलता था।
फिर गली के मोड़ पे वो आए,
जैसे धूप पे पहले बादल छाए।
उनको देखा, तो सूरज भी झुक गया,
तपता हुआ वो पल वहीं रुक गया।
हवा चली, तो उनकी नज़र ले आई,
सूने दिल में इक ख़ुशबू-सी छाई।
जो ग़म बरसों से सीने में ठहरे थे,
वो बूँद-बूँद होकर बिखरे थे।
पलकों पे उनकी घटाएँ घिर आईं,
आँखों में सावन की बूँदें भर आईं।
न बारिश हुई, न बादल गरजे,
फिर भी भीग गए हम, बिन बरसे।
यारो, मौसम तो रोज़ ही बदलते हैं,
पर ऐसे कहाँ दिल में ढलते हैं।
बस इक नज़र मिली थी,
और दिल का मौसम बदल गया।